Rajasthan ki pramukh Sabhyata

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Major Prehistoric Civilizations of Rajasthan | राजस्थान की प्रमुख प्रागैतिहासिक सभ्यताएँ

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Major Prehistoric Civilizations of Rajasthan | राजस्थान की प्रमुख प्रागैतिहासिक सभ्यताएँ

नामकरण:-

राजस्थान शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख “चित्तौडगढ शिलालेख” (532 ई.) में राजस्थानीय शब्द के रूप में प्राप्त हुआ है |

राजस्थानीयादित्य शब्द के रूप में राजस्थान शब्द का दूसरा लेल्ख 625 ई. के “बसंतगढ़ शिलालेख” (सिरोही) से प्राप्त हुआ है |

कुवलयमाला (उधौतनसूरी कृत), “नैणसी री ख्यात”, “तारीख-ए-राजस्थान” (कालीराम कायस्थ कृत) में भी राजस्थान शब्द का प्रयोग किया गया है |

सर्वप्रथम “जार्ज थामस” ने “राजपूताना” शब्द का प्रयोग 1800 ई. में किया, यह जानकारी हमें विलियम फ्रैंकलिन

द्वारा लिखित पुस्तक “द मिलिट्री मेमॉयर्स ऑफ़ मिस्टर जार्ज थामस” से प्राप्त हुई है |

कर्नल जेम्स टॉड:-

उपाधि:- राजस्थान इतिहास का पितामह

प्रसिद्धि:- घोड़े वाले बाबा

गुरु:- यति ज्ञान चंद्र

पुस्तक:-

1 एनल्स एंड एंटीक्वीटीज ऑफ़ राजस्थान (1829 ई.)

2 ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इंडिया (1839 ई.)

सर्वप्रथम 1829 ई. में राजस्थान शब्द का प्रयोग अपनी पुस्तक ‘एनल्स’ में किया |

‘रायथान’ एव ‘रजवाड़ा’ शब्दों का प्रयोग भी किया |

1 कालीबंगा सभ्यता | Kalibanga Civilization:-

स्थित:- हनुमानगढ़ के पीलीबंगा में

पहचान:- डॉ. L.P. टैस्सीटोरी

नदी:- घग्गर (इसका प्राचीन नाम सरस्वती)

विशेषताएँ:-

खोज:- अमलानंद घोष ने लगभग 1952 ई. में

इसे हडप्पा सभ्यता की ‘तृतीय राजधानी’ भी कहते थे |

उत्खननकर्ता:- बी.बी. लाल व बी. के. थापर ने 1961 ई.

हड़प्पा की ‘दीनहीन बस्ती’

अर्थ:- ‘काली चूड़ियाँ’

—– स्वतंत्रता के बाद भारत में खोजा गया प्रथम हडप्पाई स्थल रोपड़ (पंजाब) में 1950 ई. में ——

प्राप्त वस्तुऐ:-

मिट्टी की बैलगाड़ी, हड़प्पाई लिपि युक्त मृदभांड, लकड़ी की नालियाँ, भूकंप के साक्ष्य, हाथी दांत की कंघी

ताम्र-पिन, बेलनाकार मेसोपोतामियाई मुहर, मकानों में कच्ची ईंटो का प्रयोग, तोल के बाट, ताम्र चाकू

शंख की चूड़ियाँ, अग्नि वेदिकाए (यज्ञकुंड), हल की लकीरे (प्राचीनतम जुते हुए खेत), हड्डी की सलाईयाँ

ताम्र वृषभ (सांड) प्रतिमा (राजस्थान में धातु प्रीतमा का प्राचीनतम उदाहरण)

जाल पद्धति कृषि व्यवस्था (एक खेत में एक ही समय दो में दिशाओं में दो भिन्न फासले)

2 गणेश्वर सभ्यता | Ganeshwar civilization:-

स्थिति:- नीमकाथाना (सीकर)

नदी:- कंतली

अवधि:- 2800 ईसा पूर्व से 2200 ईसा पूर्व

खोजकर्ता व उत्खननकर्ता:- R.C. अग्रवाल

प्रसिद्धि:-

1 ‘सबसे प्राचीन ताम्र-युगीन सभ्यता’  2 ‘सर्वाधिक शुद्ध ताम्र-उपकरण प्राप्त’

अन्य नाम:-

1 ‘ताम्र युगीन सभ्यताओं की जननी’  2 ‘पुरातत्व का पुष्कर’

प्राप्त ताम्र-वास्तुऐ:-

1 400 बाणाग्र    2 58 कुल्हाड़ियाँ    3 50 मछली पकड़ने के कांटे

3 आहड़ सभ्यता | Guise civilization:-

स्थिति:- उदयपुर

नदी:- बनास-बेडच नदी

खोजकर्ता:- अक्षयकीर्ति व्यास (ऐ.के. व्यास- 1953 ई.)

उत्खननकर्ता:-

1 एच.डी. सांकलिया   2 आर.सी. अग्रवाल

अन्य नाम:- 1 बनास संस्कृति   2 धुलकोट    3 ताम्रवती (ताम्बावती) नगरी

प्रसिद्धि:- ‘सर्वाधिक मात्रा में ताम्र-उपकरण प्राप्त’

प्राप्त वस्तुऐ एंव विशेषताऐ:-

ताबा गलाने की भट्टियाँ, हडडी का चाकू, टेराकोटा निर्मित 2 स्त्री धड़, मिट्टी का तवा, कपड़े की छपाई हेतु लकड़ी के बने ठप्पे, सिर खुजलाने का यंत्र, सुराही, ईरानी शैली के छोटे हत्थेदार बर्तन, एक मकान में 7 चूल्हे एक पंक्ति में,

मकानों की नीवों में पत्थरों का प्रयोग

4 बैराठ सभ्यता | Barat civilization:-

स्थिति:- जयपुर

नदी:- बाणगंगा

खोजकर्ता:- दयाराम साहनी, सुंदर राजन, ए.घोष, के.एन. दीक्षित

प्राप्त वस्तुऐ:-

अशोक का ‘भाब्रू शिलालेख’

विशेषता:- राजस्थान में बौद्ध संस्कृति का प्रमुख केंद

बुद्ध प्रतिमा युक्त स्वर्ण मजुषा – हुण आक्रमणों का साक्षी

सूती वस्त्र अवशेष – इंडोग्रीक नरेश मिनाणडर से सम्बंधित क्षेत्र

नाचते पक्षी की मृणमूर्ति – छठी शताब्दी ई.पू. में मत्स्य महाजनपद की राजधानी

हेंसांग ने बैराठ की यात्रा करके ‘पारयात्र’ नाम प्रदान किया |

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प्रचीन जनपद | Ancient district:-

1 जांगल देश:- जोधपुर एंव बीकानेर का क्षेत्र महाभारत काल में ‘जांगल देश’ कहलाता था, इसकी राजधानी ‘अहिच्छत्रपुर’ थी, जिसे वर्तमान में नागौर कहते है | बीकानेर के राजा इस जांगल देश के स्वामी थे इसलिए उन्होंने अपने आपको ‘जंगलधर बादशाह’ कहा है | बीकानेर राज्य के चिन्ह में ‘जय जंगलधर बादशाह’ लिखा मिला है |

2 मत्स्य देश:- अलवर, करौली, जयपुर तथा भरतपुर का कुछ भाग ‘मत्स्य’ देश का क्षेत्र का | इसकी राजधानी विराटनगर (जो कि आधुनिक बैराठ) थी | महाभारत काल में यह राज्य राजनितिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है |

3 शूरसेन:- भरतपुर, धौलपुर तथा करौली का क्षेत्र ‘शूरसेन’ राज्य के अंतर्गत आता था, जिसकी राजधानी ‘मथुरा’ हुआ करती थी |

4 अर्जुनायन:- शुंग-कण्व काल में अलवर, भरतपुर, आगरा एंव मथुरा का भू-भाग ‘अर्जुनायन’ राज्य कहलाता था |

इस क्षेत्र में अजुनायन जयः अंकित सिक्के प्राप्त हुए है |

5 शिवि:- चितौड़ का क्षेत्र ‘शिवि’ राज्य कहलाता था | इसकी राजधानी ‘मध्यमिका’ हुआ करती थी |

जिसे वर्तमान में ‘नगरी’ कहा जाता है |

6 मेदपाट (मेवाड़):- परवर्ती काल में उदयपुर-चितौड़ के शासकों को म्लेच्छो से निरतर संघर्ष करना पड़ा, इसलिए म्लेच्छो को मारने वाला, अर्थात ‘मेद’ कहा जाने लगा तथा उनके क्षेत्र को ‘मेदपाट’ जिसे ‘मेवाड़’ कहा जाता है |

उदयपुर, राजसमन्द, चितौड़, भीलवाड़ा, बांसवाडा और डूंगरपुर जिले इसके अंतर्गत आते है |

7 मारवाड़:- इसे प्रारम्भ में ‘मरु’ और फिर ‘मरु वार’ और अंत में ‘मारवाड़’ कहा जाने लगा |

8 गुर्जरत्रा:- जोधपुर के दक्षिण भाग को गुर्जरत्रा कहते थे |

9 अर्बूदेश:- सिरोही के आस-पास के क्षेत्र की गणना ‘अर्बूद देश’ में की जाती थी |

10 मांड:- जैसलमेर राज्य को पूर्वकाल में ‘मांड’ कहा जाता था |

11 सपादलक्ष:- जांगल देश के पूर्व भाग को ‘सपादलक्ष’ कहते थे | सपादलक्ष क्षेत्र पर चौहान शासको का राज्य स्थापित हुआ और ये ‘सपादलक्षीय नृपति’ कहलाने लगे | जब इनका राज्य विस्तार हुआ तथा राजधानी ‘शाकम्भरी’ (सांभर) हुई तब ये ‘शाकम्भरीश्वर’ कहलाने लगे |

12 हाड़ौती:- कोटा एंव बूंदी जिलो का क्षेत्र ‘हाड़ौती’ कहलाता है |

13 ढूंढ़ाड:- जयपुर के आस पास का क्षेत्र ‘ढूंढ़ाड’ कहलाता है |

 

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अजमेर / साभर के चौहान | Ajmer / Sabhar K Chauhan

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